ट्रम्प का वैश्विक वर्चस्ववाद और प्रतिरोध का संकट

क्यूबा एक बार फिर अंधेरे में डूब गया। एक सप्ताह के भीतर दूसरी बार पूरे देश की बिजली व्यवस्था ठप हो गई। पहली दृष्टि में यह तकनीकी विफलता या जर्जर विद्युत ढाँचे का मामला लग सकता है, लेकिन इसके पीछे केवल तकनीकी कारण नहीं हैं। यह उस वैश्विक शक्ति-संतुलन का परिणाम भी है जिसमें एक महाशक्ति अपने आर्थिक और सामरिक दबाव के माध्यम से दूसरे देशों के जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास करती है।

क्यूबा दशकों से अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। बीसवीं शताब्दी के साठ के दशक से जारी यह प्रतिबंध आधुनिक इतिहास का सबसे लंबा आर्थिक नाकाबंदी अभियान माना जाता है। किंतु 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल के बाद इस नीति को और अधिक आक्रामक रूप दिया गया। वेनेज़ुएला से क्यूबा को मिलने वाली तेल आपूर्ति रुक गई, ईंधन उपलब्ध कराने वाले देशों को भारी शुल्क की धमकी दी गई और क्यूबा पर अतिरिक्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए।

परिणामस्वरूप पहले से संकटग्रस्त ऊर्जा व्यवस्था लगभग चरमरा गई। सार्वजनिक परिवहन, अस्पताल, उद्योग और सामान्य नागरिक जीवन गंभीर संकट में पहुँच गए।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टुर्क ने चेतावनी दी कि ईंधन और दवाओं की कमी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों, बीमारों और गरीबों पर पड़ रहा है। यदि किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था से असहमति है तो उसका समाधान उस देश के नागरिकों को सामूहिक दंड देकर नहीं निकाला जा सकता। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की मूल भावना भी यही कहती है कि राजनीतिक संघर्ष का बोझ आम जनता पर नहीं डाला जाना चाहिए।

यह केवल क्यूबा का प्रश्न नहीं है। ट्रम्प की विदेश नीति का मूल स्वर यह रहा है कि अमेरिकी हितों के सामने अन्य देशों की संप्रभुता गौण है। आर्थिक प्रतिबंध, व्यापार युद्ध, अतिरिक्त शुल्क, वित्तीय नाकेबंदी और सैन्य दबाव—इन सभी को विदेश नीति के सामान्य औजार बना दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका लगातार कमजोर हुई है।

दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ शक्ति ही न्याय का पर्याय बनती जा रही है। यदि कोई देश अमेरिकी रणनीतिक हितों से असहमत होता है तो उसे आर्थिक, राजनीतिक या सैन्य दबाव का सामना करना पड़ता है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में समानता का सिद्धांत कमजोर हुआ है।

विडंबना यह है कि जिन देशों को लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्रता का सबसे बड़ा संरक्षक बताया जाता है, वही देश अनेक बार दूसरे राष्ट्रों की राजनीतिक और आर्थिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप करते दिखाई देते हैं। इराक, लीबिया, अफगानिस्तान, सीरिया, ईरान, वेनेज़ुएला और अब क्यूबा—इन सभी उदाहरणों में विभिन्न रूपों में आर्थिक प्रतिबंधों और बाहरी हस्तक्षेप की राजनीति देखने को मिलती है।

सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि इस वर्चस्ववादी राजनीति के विरुद्ध कोई प्रभावी वैश्विक प्रतिरोध विकसित नहीं हो पा रहा। यूरोपीय देश अधिकांश मामलों में अमेरिकी नीतियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएँ नैतिक अपीलों तक सीमित रह जाती हैं। विकासशील देशों का सामूहिक मंच पहले जैसी प्रभावशीलता खो चुका है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन लगभग निष्क्रिय है और वैश्विक दक्षिण अभी तक ऐसा साझा राजनीतिक मंच नहीं बना सका है जो महाशक्तियों की मनमानी को चुनौती दे सके।

यह प्रतिरोध का संकट केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संकट नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का भी संकट है। यदि कोई महाशक्ति यह तय करने लगे कि किस देश को तेल मिलेगा, किसे दवा मिलेगी, किसे व्यापार करने का अधिकार होगा और किस सरकार को वैध माना जाएगा, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पूरा ढाँचा असंतुलित हो जाता है।

क्यूबा का अंधेरा केवल बिजली का अंधेरा नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें आर्थिक प्रतिबंधों को युद्ध के नए हथियार में बदल दिया गया है। पहले युद्ध बमों से लड़े जाते थे, अब बैंकिंग व्यवस्था, तेल आपूर्ति, व्यापार और तकनीक को हथियार बनाया जा रहा है। इनका सबसे बड़ा शिकार सैनिक नहीं, बल्कि सामान्य नागरिक बनते हैं।

यह भी सच है कि किसी भी देश की आंतरिक नीतियों, प्रशासनिक अक्षमताओं या आर्थिक कुप्रबंधन की आलोचना आवश्यक है। किंतु बाहरी आर्थिक घेराबंदी और नागरिक आबादी को सामूहिक दंड देना किसी भी लोकतांत्रिक या मानवीय सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान होना चाहिए, न कि दंडात्मक वर्चस्व।

आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि विश्व व्यवस्था में शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा है, जबकि उसके विरुद्ध संगठित नैतिक और राजनीतिक प्रतिरोध कमजोर होता जा रहा है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो भविष्य में कोई भी छोटा या मध्यम आकार का राष्ट्र अपनी स्वतंत्र विदेश नीति चलाने में स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करेगा।

क्यूबा का अंधकार इसलिए पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि जब वैश्विक राजनीति में शक्ति, न्याय पर हावी हो जाती है और संप्रभुता का सम्मान समाप्त होने लगता है, तब संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता। वह पूरी मानवता की साझा समस्या बन जाता है।

आज आवश्यकता केवल क्यूबा के समर्थन की नहीं, बल्कि ऐसी विश्व व्यवस्था के निर्माण की है जिसमें किसी भी महाशक्ति को यह अधिकार न हो कि वह अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूरे देशों की जनता को अंधेरे, भूख और अभाव में धकेल दे। अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत किए बिना वैश्विक शांति और न्याय की कल्पना अधूरी रहेगी।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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